दिल और सेहत का वह ईस्ट्रोजन है। जो स्त्रीत्व को उसकी पहचान देने वाला हॉर्मोन ,जो रूप देता है और सेहत भी।हांईस्ट्रोजन
महिलाओंमें पायाजाने वाला एक प्रमुख हॉर्मोन ,जो कि इन्हे अभिसार के पूर्व और उपरांत के सभी कार्यो के लिए सक्षम बनाता है। वयः संधि से लेकर यौनेच्छा और प्रजनन सभी के लिए इसकी समुचित मात्रा चाहिए। यह हॉर्मोन प्रमुख रूप से तो ओवरी में बनता है लेकिन गर्भावस्था के दौरान प्लैसेंटा भी इसका एक स्त्रोत हो जाता है और मेनोपॉज के उपरांत तो मात्र शरीर में विध्यमान फैट तथा एड्रीनल ऊतक ही इसका स्त्रोत होते है। सेहत और दिल के लिए जरूरी है
कोई भी जैव रसायन ,जैव पदार्थ ,शरीर में रक्त के साथ बह कर पूरे शरीर में पहुंचता है। तो वह अपने प्रमुख कार्य के अलावा विभित्र अन्य अंगो और क्षेत्रों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। ये बात ईस्ट्रोजन पर भी लागू होती है। यह महिला प्रजनन तंत्र के अतिरिक्त हड्डियों और रक्त में प्रवाहित होने वाली वसा प्रमुखतः कोलेस्ट्रॉल के स्तर को भी प्रभावित करता है। रोलरकोस्टर हॉर्मोन होता है
हमारे जीवन की विभित्र अवस्थाएं है - बाल्यावस्था , युवावस्था , प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था। एक स्त्री के शरीर इन सभी अवस्थाओं में ईस्ट्रोजन की मात्रा कम या अधिक होती रहती है ,यहां तक कि माहवारी चक्र में भी ईस्ट्रोजन का स्तर बदलता रहता है। किंतु किसी वय में या किसी समय में यदि यह यथोचित न हो तो समस्या खड़ी हो जाती है। माहवारी से पहले की उलझन को उस समय इसके कम स्तर से जोड़कर देखा जाता है। शरीर में अधिक मात्रा में ईस्ट्रोजन होने पर वयःसंधि और युवावस्था में बहुत अधिक संख्या में और गहरे मुंहासे हो सकते है या अजीब सी झुंझलाहट का अनुभव होता है या अडिनोमायोसिस अथवा फाइब्रॉइड की समस्या होती है और प्रौढ़ावस्था तक पहुंचते -पहुंचते ऐसी महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का ख़तरा बहुत अधिक हो जाता है। ईस्ट्रोजन का स्तर कम हो जाना अन्य प्रकार की समस्याएं उत्पत्र करता है। इसका स्तर जब कम होता है ,ख़ासतौर पर मेनोपॉज के बाद ,तो हाँट फ्लैशेज यानी अचानक बहुत गर्मी लगने ,रत में अचानक पसीना आने ,गब्रहत और चिड़चिड़ाहट -भरी उलझन होती है। आजकल ईस्ट्रोजन और मानसिक परिस्थियों और रोग जैसे डिप्रेशन ,अल्जाइमर तथा शिजोफ्रीनिआ के बीच के संबंध को लेकर भी काफी शोध हो रहे है। clickगर्भधारण करना कवच है
बहुत बार ये खतरा महिलाएं ख़ुद भी बढ़ा लेती है। वो ऐसे की इस्ट्रोजन या महिला हॉर्मोन एक्सिस ( जिसमे ईस्ट्रोजन के जोड़ीदार प्रोजेस्ट्रोन का भी बड़ा योगदान है ) गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान संयमित रहता है। एक स्त्री के युवा काल से मेनोपॉज होने तक यह स्थिति जितनी बार आए अच्छा रहता है क्योंकि इससे हॉर्मोन की मात्रा कम रहती है और इसीलिए माँ न बनने का फैसला या शिशु को स्तनपान न कराना इस खतरे को बढ़ा देता है। वैसे अल्कोहल का अत्यधिक मात्रा में सेवन भी ईस्ट्रोजन का स्तर बढ़ा देता है। दिल की रक्षा
ऐसी बात नहीं है कि ईस्ट्रोजन केवल स्त्रियों के सुमुख और शरीर सौष्ठव और उसके उचित कार्य करने के लिए ही उपयोगी है। यह हॉर्मोन एक स्त्री को ह्रदय रोग से प्रतिरक्षण भी देता है। मेनोपॉज के उपरांत जैसे -जैसे शरीर में ईस्ट्रोजन का स्तर कम होता जाता है ह्रदय रोग से प्रतिरक्षण का प्रोटेक्शन हटता जाता है और धीरे -धीरे बढ़ती वय के साथ यह ख़तरा बढ़ता जाता है।
उधर दूसरी तरफ ईस्ट्रोजन की यथोचित मात्रा न होने पर हड्डियां कमजोर हो जाती है जिसे ओस्टियोपोरोसिस कहते है। इससे फ्रैक्चर का खतरा बढ़ता जाता है और टूटी हड्डियां जुड़ने में समय लगने लगता है। मेनोपॉज उपरांत आयु की स्त्रियों में यह एक बड़ी समस्या है। त्वचा पर असर
ईस्ट्रोजन की कमी कोलेजन का उत्पादन भी कम कर देती है जिससे त्वचा सूखी पतली और झुर्रीदार होने लगती है क्योंकि कोलेजन त्वचा का एक प्रमुख भाग होता है जो उसे जीवंत बनाने में अत्यधिक योगदान देता है। नियंत्रण में रखने के तरीके है
कभी -कभी ईस्ट्रोजन की कमी की पूर्ति रिप्लेसमेंट थैरेपी से की जाती है। मेनोपॉज के बाद महिलाओ को अपने भोजन में ईस्ट्रोजन की पूर्ति का ख़ास ध्यान रखना चाहिए। अलसी व तिल ,अंकुरित मुंग ,अखरोट ,पिस्ते और मूंगफली ,लहसुन व सोया प्रोडक्ट्स ईस्ट्रोजन के अच्छे स्त्रोत है। click
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